Sunday, February 3, 2008

एमएसपी मतलब सरकारी फर्जीवाड़ा


एमएसपी मतलब सरकारी फर्जीवाड़ा

एक क्विंटल गेहूं पैदा करने में किसान को औसतन ग्यारह सौ रुपए खर्च करना पड़ रहा है और सरकार रबी सीजन के दौरान किसानों से एक हजार रुपए क्विंटल की दर से खरीदने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित कर रखा है। किसान को प्रति क्विंटल एक सौ रुपए कम से कम घाटा होगा। पर, केंद्र सरकार बड़े ही अहसान जताने वाले अंदाज में यह घोषणा करती है कि इस बार गेहूं की सरकारी खरीद के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य में ३३ प्रतिशत का इजाफा कर दिया गया है। आखिर इस इजाफे के बाद भी तो किसान को सौ रुपए का प्रति क्विंटल नुकसान हो रहा है। फिर अहसान क्या? कुछ ऐसा ही मामला धान की खरीद में हुआ है। केंद्र सरकार ने धान की खरीद पर दो बार बोनस देने की घोषणा की, इसके बावजूद धान पैदा करने वाले किसानों को घाटा ही घाटा हो रहा है। इस घाटे का कारण यह है कि केंद्र सरकार की ओर से न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने वाली संस्था कृषि लागत व मूल्य आयोग जिन आंकड़ों के आधार पर कीमत तय करता है, वे आंकड़े दो साल पुराने होते हैं। खुद आयोग के चेयरमैन टी हक यह मानते हैं कि डायरेक्टरेट ऑफ इकोनोमिक्स एंड स्टटेसटिक्स जो आंकड़े उपलब्ध कराता है, वह दो साल पुराने हैं। इन पुराने आंकड़ो को जुटाने के लिए भी निदेशालय के अधिकारी-कर्मचारी खेतों में नहीं जाते हैं। अपने दफ्तरों में बैठे कृषि विश्वविद्यालयों के क्लकॆ यह आंकड़े तैयार करते हैं और उन्हें निदेशालय में भेज देते हैं। फिर निदेशालय के इस फर्जीवाड़े को कृषि लागत व मूल्य आयोग स्वीकार करता है और कैबिनेट को यह सुझाव भेजता है कि गेहूं की एमएसपी एक हजार और चावल का एमएसपी ७५० रुपए होगा। इस तरह साल दर साल से किसान ठगे जा रहे हैं, नहीं भईया सरकार उसे लूटती जा रही है। सरकार के इस फर्जीवाड़े के कारण ही खेती से किसान का मोहभंग हो रहा है और गांवों से शहर की ओर पलायन हो रहा है। अगली कड़ी में पढिए --माल किसान का, भुगतान होता है आढती को