Thursday, February 14, 2008
माल किसान का और भुगतान आढ़ती कोअगर
आप किसान परिवार से नहीं है और अपना माल (फसल) बेचने के लिए कभी मंडी नहीं गए हैं, तो यह खबर आपको चौंका सकती है कि किसान मंडियों में अपना माल सीधे नहीं बेच सकता है। हर साल रबी व खरीफ दोनों सीजन में सरकारी एजेंसियां, जिसमें सबसे बड़ी एजेंसी एफसीआई है, मंडियों में अपने एजेंट मतलब आढ़ती के माध्यम से फसल की खरीद करते हैं। इस व्यवस्था के कारण किसान अपनी फसल आढ़ती के यहां ढेरी लगाकर रखता है, इसके बाद एफसीआई के अधिकारी आते हैं और ढेरी देखकर उसकी कीमत तय करते हैं। कीमत तय करने में किसान का कोई रोल नहीं होता है। कीमत तय होने के बाद एफसीआई की ओर से जो चेक जारी किया जाता है, वह आढ़ती के नाम होता है। अगर किसान अपनी फसल को सीधे बेचना चाहता है, तो वह बेच नहीं सकता है। वह अपना माल आढ़ती के जरिए ही बेच सकता है। यह अलिखित कानून मंडियों में चलता है।
Sunday, February 3, 2008
एमएसपी मतलब सरकारी फर्जीवाड़ा
एमएसपी मतलब सरकारी फर्जीवाड़ा
एक क्विंटल गेहूं पैदा करने में किसान को औसतन ग्यारह सौ रुपए खर्च करना पड़ रहा है और सरकार रबी सीजन के दौरान किसानों से एक हजार रुपए क्विंटल की दर से खरीदने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित कर रखा है। किसान को प्रति क्विंटल एक सौ रुपए कम से कम घाटा होगा। पर, केंद्र सरकार बड़े ही अहसान जताने वाले अंदाज में यह घोषणा करती है कि इस बार गेहूं की सरकारी खरीद के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य में ३३ प्रतिशत का इजाफा कर दिया गया है। आखिर इस इजाफे के बाद भी तो किसान को सौ रुपए का प्रति क्विंटल नुकसान हो रहा है। फिर अहसान क्या? कुछ ऐसा ही मामला धान की खरीद में हुआ है। केंद्र सरकार ने धान की खरीद पर दो बार बोनस देने की घोषणा की, इसके बावजूद धान पैदा करने वाले किसानों को घाटा ही घाटा हो रहा है। इस घाटे का कारण यह है कि केंद्र सरकार की ओर से न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने वाली संस्था कृषि लागत व मूल्य आयोग जिन आंकड़ों के आधार पर कीमत तय करता है, वे आंकड़े दो साल पुराने होते हैं। खुद आयोग के चेयरमैन टी हक यह मानते हैं कि डायरेक्टरेट ऑफ इकोनोमिक्स एंड स्टटेसटिक्स जो आंकड़े उपलब्ध कराता है, वह दो साल पुराने हैं। इन पुराने आंकड़ो को जुटाने के लिए भी निदेशालय के अधिकारी-कर्मचारी खेतों में नहीं जाते हैं। अपने दफ्तरों में बैठे कृषि विश्वविद्यालयों के क्लकॆ यह आंकड़े तैयार करते हैं और उन्हें निदेशालय में भेज देते हैं। फिर निदेशालय के इस फर्जीवाड़े को कृषि लागत व मूल्य आयोग स्वीकार करता है और कैबिनेट को यह सुझाव भेजता है कि गेहूं की एमएसपी एक हजार और चावल का एमएसपी ७५० रुपए होगा। इस तरह साल दर साल से किसान ठगे जा रहे हैं, नहीं भईया सरकार उसे लूटती जा रही है। सरकार के इस फर्जीवाड़े के कारण ही खेती से किसान का मोहभंग हो रहा है और गांवों से शहर की ओर पलायन हो रहा है। अगली कड़ी में पढिए --माल किसान का, भुगतान होता है आढती को
Saturday, February 2, 2008
एमएसपी के नाम पर किसानों को लूटती है सरकार
सरकार एमएसपी के नाम पर किसानों को लूट लेती है और यह मदद करने का अहसान भी जताती रही है। किसानों को कैसे लूटती है सरकार, यह पढिए कल...
खेतीबाड़ी स्पेशल
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Wednesday, January 9, 2008
ये तस्वीरें कुछ बोलती हैं


ये दो तस्वीरें है। पहली तस्वीर की तारीख सात जनवरी। स्थान नार्थ ब्लाक िस्थत वित्त मंत्रालय। मौका-बजट से पहले किसानों से चर्चा। दूसरी तस्वीर की तारीख आठ जनवरी। स्थान नार्थ ब्लाक िस्थत वित्त मंत्रालय। मौका बजट से पहले उद्योगपतियों से मुलाकात।
देश के तमाम अखबार उठाइए। आप पाएंगे कि क्या हिंदी या अंग्रेजी क्या कोई भाषाई अखबार, सभी ने उद्योगपतियों से चिदंबरम से हुई मुलाकात की रंगीन तस्वीरें छापी हैं। इस तस्वीर में अपने वित्त मंत्री उद्योगपतियों से मुस्कुराते हुए मिल रहे हैं। किसानों से हुई मुलाकात की तस्वीर में चिदंबरम की मुस्कुराहट गायब है। और तस्वीरें भी अखबारों में ब्लैक-व्हाइट छपी है।
तस्वीरों से पीछे का सच और भी कड़ुवा है। चिदंबरम किसानों से केवल दस मिनट के लिए। और उद्योगपतियों से ... अनुमान लगाइए... क्या सवा घंटे?
क्या सचमुच भारत किसानों का देश है? क्या खेती व किसानों के लिए मात्र दस मिनट काफी है?
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